सेवा करने का फल की कहानी :

सेवा करने का फल की  कहानी :

कुछ समय पहलेकी बात है। एक शहर सम्पूर्ण देशमें व्याप्त हो चुका था। उसी समय मैं रामायणपर प्रवचन करनेके हेतु नवरोजाबाद गया। वहाँ जाते ही इनफ्ल्यूएंजाने मुझे भी अपने चंगुलमें धर दबाया। मैं अशक्त हो गया। सर्वत्र निराशा दीखने लगी।उसी समय वर्षा भी होने लगी। ऐसी विपत्तिमें कोई बात पूछनेवाला भी नहीं दिखायी पड़ रहा था। तीन बज रहे थे। 

  

 


बुखार जोरोंसे चढ़ा था।जिस मन्दिरमें रुका था, वह भी वर्षाके आघात को सहन करनेमें असमर्थ था। ऐसी स्थितिमें मैं रामायणकी चौपाईको धीरे-धीरे पढ़ने लगा। उसी समय एक बुढ़िया माई मेरे पास आयी और बिना कुछ कहे सुने ही मेरा लाउडस्पीकर, हारमोनियम और सारा सामान उठा लिया और बोली ‘बाबा चलो।

 

मैं भी बिना किसी हिचकिचाहटके लड़खड़ाते हुए चल पड़ा। वहाँ जाकर मैं लेट गया। मुझे नींद आ गयी । पाँच बजे उठा तो देखा कि बुढ़िया भीगी हुई मेरी चारपाईके पास बैठी रो रही है। मैंने पानी माँगा। वहाँ किसीसे मैं परिचित भी नहीं था। अकेला ही था। इसीसे विशेष घबरा गया। पासमें विशेष पैसे भी नहीं थे, जिससे कि घर ही किसी प्रकार जा सकूँ। बहुत बड़े चक्करमें पड़ गया। बुढ़ियाने पानी देते हुए कहा-‘बेटा ! तू जल्दीसे अच्छा हो जा।’

 
इतना कहकर उसने ‘ऐस्प्रो’ की दो टिकिया मुझे पानी के साथ खिला दी। मुझे कुछ आराम मालूम पड़ा। रात्रिमें बिना कुछ खाये ही मैं सो गया। जब दो बजे रातको नींद खुली तो देखा, बुढ़िया बैठी है। उसकी आँखोंसे प्रेमाश्रु दल रहे हैं। मैंने कहा –‘माँ! तू बैठकर रोती क्यों है? बुढ़ियाने आँसू पोंछते हुए कहा- ‘बेटा! सो जा, कुछ नहीं। मैं सो रही थी; अभी तो आयी हूँ।’आग्रह करनेपर बुढ़िया माईने कहा ‘बेटा! मेरे ऐसे भाग्य कहीं, जो मैं सेवा कर सकूँ। मैं अपनेको धन्य समझती हूँ कि तूने मेरी सेवा स्वीकार की।


बेचारी इस प्रकार प्यार करती मुझे चाय बनाकर पिलाती और सेवा करती। वैसे यह बीमारी तीन दिनोंके पहले नहीं समाप्त होती, पर मैं दो ही दिनोंमें पूर्ण स्वस्थ हो गया। स्वस्थ होनेपर कथा हुई। लोग अपने यहाँ भोजनके लिये आमन्त्रित करते, अच्छा स्थान भी रहनेके लिये देते, पर बुढ़ियाके वात्सल्यभावको देखकर मैं कहीं नहीं गया। कथा समाप्त होनेपर दो सौ रुपये दक्षिणास्वरूप प्राप्त हुए। मैंने अपनी उस बुढ़िया माईके चरणोंमें ले जाकर इस पत्र पुष्पको समर्पित कर दिया। बेटा! मेरी दक्षिणा तो यही होगी कि हमेशा तू इस अभागिन माँकी सेवा स्वीकार करता रह।’ बुढ़िया माईकी इस स्नेहभरी वाणीको श्रवणकर मैं आनन्द-विभोर हो गया।



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